Muharram

लड़खड़ाते हैं कदम हालाते "रोज़े" में थोड़ा चलने के बाद कैसे चला होगा काफ़िला कर्बला में "हुसैन" की शहादत के बाद प्यासे असगर का कर्बला में वो मंजर तो सोच तू भूल जाएगा कहना की रोजेदार हूँ मैं

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