लड़खड़ाते हैं कदम हालाते "रोज़े" में थोड़ा चलने के बाद कैसे चला होगा काफ़िला कर्बला में "हुसैन" की शहादत के बाद प्यासे असगर का कर्बला में वो मंजर तो सोच तू भूल जाएगा कहना की रोजेदार हूँ मैं
अज़माइशों से ही गुज़रती है ज़िंदगी मोमिन की हमेशा ही खुश रहो ये कैसी तुम्हारी मिन्नत है जद्दोजहद ही मुक़द्दर रहेगा अबाबील तुम्हारा दिल से निकाल दो की सिर्फ मीठा खाना ही सुन्नत है